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2019-06-02 

चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।. आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ १६॥

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी— (ये) चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।
Four types of devotees of noble deeds worship Me, Arjuna, the seeker after worldly possessions, the afflicted, the seeker for knowledge, and the man of wisdom, O best of Bharatas. (7:16)
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2019-05-26 

Those whose wisdom has been carried awayby Maya, and are of demoniac nature, suchfoolish and vile men of evil deeds do notadore Me.

(7:15)
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2019-05-26 

न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा:।. माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:॥ १५॥

परन्तु—
मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा गया है, (वे) आसुर भावका आश्रय लेनेवाले (और) मनुष्योंमें महान् नीच (तथा) पाप-कर्म करनेवाले मूढ़ मनुष्य मेरे शरण नहीं होते।
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2019-04-21 

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।. मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ १४॥

क्योंकि मेरी यह गुणमयी दैवी माया दुरत्यय है अर्थात् इससे पार पाना बड़ा कठिन है। जो केवल मेरे ही शरण होते हैं, वे इस मायाको तर जाते हैं।
For, this most wonderful Maya (veil) of Mine,consisting of the three Gunas (modes of Nature),is extremely difficult to breakthrough; those,however, who constantly adore Me alone, areable to cross it. (7:14)
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2019-04-02 

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभि: सर्वमिदं जगत्।. मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्॥ १३॥

किन्तु— इन तीनों गुणरूप भावोंसे मोहित यह सम्पूर्ण जगत् (प्राणिमात्र) इन गुणोंसे अतीत अविनाशी मुझे नहीं जानता।
The whole of this creation is deluded by these objects evolved from the three modes of Prakrti Sattva, Rajas and Tamas; that is why the world fails to recognize Me, standing apart from these the imperishable. (7:13)
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2019-04-01 

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।. मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ १२॥

जितने भी सात्त्विक भाव हैं (और) जितने भी राजस तथा तामस (भाव हैं,वे सब) मुझसे ही होते हैं— ऐसा उनको समझो। परन्तु मैं उनमें (और) वे मुझमें नहीं हैं।
Whatever other entities there are, born of Sattva(the quality of goodness), and those that are/born of Rajas (the principle of activity) and Tamas (the principle of inertia), know them all as evolved from Me alone. In reality, however, neither do I exist in them, nor do they in Me. (7:12)
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2019-03-26 

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।. धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ ११॥

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! बलवानोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ और प्राणियोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ।
Arjuna, of the mighty I am the might, freefrom passion and desire; in beings I am thesexual desire not conflicting with virtue orscriptural injunctions.(7:11)
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2019-03-07 

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।. बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥ १०॥

हे पृथानन्दन! सम्पूर्ण प्राणियोंका अनादि बीज मुझे जान। बुद्धिमानोंमें बुद्धि (और) तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ।
Arjuna, know Me the eternal seed of all beings. I am the intelligence of the intelligent;the glory of the glorious am I. (7:10)
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2019-02-20 

पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।. जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ ९॥

पृथ्वीमें पवित्र गन्ध (मैं हूँ) और अग्निमें तेज मैं हूँ तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें जीवनीशक्ति (मैं हूँ) और तपस्वियोंमें तपस्या मैं हूँ।
I am the pure odour (the subtle principle of smell) in the earth and the brightness in fire; nay, I am the life in all beings and austerity in theascetics.(7:9)
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2019-01-09 

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो:।. प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नृषु॥ ८॥

हे कुन्तीनन्दन! जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार), आकाशमें शब्द (और) मनुष्योंमें पुरुषार्थ (मैं हूँ)।
Arjuna, I am the sap in water and the radiance of the moon and the sun; I am the sacred syllable OM in all the Vedas, the sound in ether, and virility in men. (7:8)